शिक्षण के जरूरी आयाम

शिक्षण (Teaching) के जरूरी आयाम 

शिक्षण में कक्षा का वातावरण, सीखने का अवसर, अभ्यास/अनुप्रयोग/गतिविधियाँ, शिक्षण रणनीति, लक्ष्य आधारित मूल्यांकन आदि पर गंभीरता से विचार करना होता है।

कक्षा का अच्छा वातावरण –

बच्चों का अच्छा सीखना एक अच्छे कक्षा के वातावरण में ही संभव हो पाता है। अच्छा वातावरण – एक ऐसा स्थल जहां बच्चों का देखभाल एवं समुदाय का सहयोग महत्वपूर्ण स्थान रखता हो।  इस देखभाल में बच्चों का जेंडर, जाति, धर्म, सामाजिक एवं आर्थिक पृष्ठभूमि आड़े नहीं आता हो। जहां शिक्षकों और बच्चों के मध्य एवं बच्चों और बच्चों के मध्य अंतर्क्रिया करने का पूरा अवसर होता हो।  जहां बच्चे यह उम्मीद करते हों कि शिक्षक उन्हें सीखने के सभी गतिविधियों में शामिल करेंगे। कक्षा में बच्चों के ज्ञान और अनुभवों को स्थान देते हुए उन्हें सीखने में लिप्त करने वाला शिक्षण ही सही शिक्षण है। जिसमें उनकी सामाजिक / संस्कृति को भी ध्यान में रखा जाता हो.

शिक्षण
शिक्षण और कक्षा का वातावरण

कक्षा में गतिविधियां –

कक्षा में संचालित गतिविधियों के दौरान बच्चों द्वारा की गयी गलतियों को उनके सीखने की स्वाभाविक प्रक्रिया के रूप में देखना होता है. एक ऐसा वातावरण जहां बच्चे आपस में एक-दुसरे की सहायता करने को सीखने की प्रक्रिया में शामिल करते हों तथा बिना डर-भय-संकोच के प्रश्न करते हुए सीखते हों.

सीखने का अवसर –

कक्षा में बच्चों को सीखने का अवसर कितना मिलता है यह निर्भर करता है कि उन्हें पाठ्यक्रम / पाठ्यचर्या द्वारा निर्धारित विषयवस्तुओं की गतिविधियों में भाग लेने का कितना अवसर मिलता है और यही उनका सीखना सुनिश्चित करता है. यहाँ सीखने के अवसर में ‘समता’ और ‘समानता’ जैसे शब्दों के असल मायने को ध्यान में रखना होता है.

पाठ्यक्रम संरेखण –

पाठ्यक्रम पर कार्य करते हुए यह देखा जाना चाहिए कि इसके सभी घटक शिक्षा के उद्देश्यों को पूरा करने वाला हो. आमतौर पर किसी विषयवस्तु पर कार्य करते हुए शिक्षा के बड़े / सामान्य उद्देश्यों को हम भूल जाते हैं. उदाहरण के लिए जब नक्शा पढ़ना सिखा रहे होते हैं तो हमारा पूरा ध्यान ‘नक़्शे का पठन कौशल’ विकसित करने में चला जाता है जबकि शिक्षण के हर क्षण हमें शिक्षा के बड़े / सामान्य उद्देश्यों को जो लम्बे समय अंतराल के बाद पूरा होना होता है, को भी अवश्य ध्यान में रखा जाना चाहिए. यहाँ यह भी देखा जाना महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या बच्चे एक-दुसरे से सहयोगात्मक ढंग से सीख रहे हैं? यही सहयोग की भावना व्यस्क समाज को वांछित समाज की ओर ले जाएगा.

अनुप्रयोग और अभ्यास / गतिविधियाँ –

जहां तक सीखने की बात है ज्यादातर बच्चों को अभ्यास के मौके और करके देखने का मौक़ा देने से सीखने के लिए उत्साहित नज़र आते हैं. वे अपने सीखे हुए को और अच्छा करने के लिए अभ्यास की मांग करते हैं बशर्ते शिक्षक ने सीखने का वातावरण बनाया हो. अभ्यास और अनुप्रयोग की दिशा में अवसर उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बच्चों को गृह कार्य देना भी सार्थक कदम हो सकता है.

बच्चों को गृह कार्य देना आदर्श स्थिति में अनुचित समझा जाता है. इसके बावजूद प्रश्नों की प्रकृति और कठिनाई स्तर को ध्यान में रखकर गृह कार्य देने से अभ्यास के अवसर को बढाया जा सकता है. यह गृह कार्य ऐसा हो सकता है जिसे वह स्वतंत्र रूप से स्वयं कर सके. गृह कार्य देने के बाद यह सावधानी अवस्य रखनी चाहिए कि उसे जांचा जाए और आवश्यकतानुसार उसमें सुधार कराया जाए या सुधारने का मौका दिए जाएं.

शिक्षक रणनीति –

शिक्षण रणनीति में  सामान्यतया सीखना एवं अध्ययन कौशल के अलावा अर्थ निर्माण, गणितीय समस्याओं को सुलझाना तथा वैज्ञानिक ढंग से तार्किक सोच के लिए शिक्षण करना शामिल होता है. शिक्षण के दौरान सम्पूर्ण रणनीति में कुछ सवाल बच्चों के ज्ञान के सन्दर्भ में किया जा सकता है, जैसे कि कोई ज्ञान / जानकारी / समझ को बच्चे क्या जानते हैं? कैसे जानते हैं? तथा इस समझ या जानकारी को कब, क्यों और किन परिस्थितियों में उपयोग कर सकते हैं? इस प्रकार के प्रश्नों को केंद्र में रखकर शिक्षण की रणनीति को पुख्ता बनाया जा सकता है.

सहयोगात्मक ढंग से सीखना –

शिक्षण में बच्चों के सीखने की प्रक्रिया और प्रकृति को भी ध्यान में रखना होता है. जब हम कहते हैं कि बच्चा स्वयं सीखता है, अपने साथी से सीखता है, छोटे समूहों में सीखता है तो इसे Co-operative Learning  के रूप में देखना होगा. इस प्रकार का Co-operative Learning प्रभावशाली शिक्षण एवं सामाजिक अंतर्क्रिया को प्रोत्साहित करता है. यह बच्चों की रूचि विषयगत मूल्य, एवं उनके सकारात्मक अभिवृत्ति (Attitude) को भी बढ़ाता है. यद्यपि ये बच्चे दर बच्चे अलग-अलग हो सकता है. Co-operative Learning में चूंकि चर्चा शामिल होता है, जिससे उनमें संज्ञानात्मक एवं उनके Metacognative  क्षमता को पालने-बढ़ने की पुरी गुंजाइश होती है। 

परम्परागत शिक्षण प्रक्रिया

इसमें पुरी कक्षा को किसी एक ही विषयवस्तु / पाठ में एक साथ एक ही स्तर का मानकर शिक्षण कराया जाता है साथ ही बच्चों को जो कार्य दिए जाते हैं उसे सभी बच्चे व्यक्तिगत रूप से करते हैं जिसे एक नियत समय में  करना ही होता है. Co-operative Learning में भी पुरी कक्षा के साथ एक साथ ही काम होता है, लेकिन इसमें बच्चों का जोड़ी में काम करना, साथी के साथ मिलकर काम करना, छोटे समूहों में भागीदारी करते हुए काम करना इसे विशिष्ट बना देते हैं. यह सीखने को सार्थक बना देता है. जिसे सामाजिक मूल्यों के साथ भी जोड़ कर देखा जा सकता है.

सहयोगात्मक शिक्षण में शिक्षण सहायक सामग्री का भी महत्वपूर्ण योगदान है. इसमें विशेषकर छोटे समूहों में कार्य करने का अवसर देना कक्षा में उपलब्ध शिक्षण सहायक सामग्री पर भी निर्भर करता है. उदाहरण के लिए बच्चों में ‘ग्लोब’ की समझ एवं पठन कौशल विकसित करने के लिए छोटे समूहों में सीखने का अवसर देना है तो कक्षा में एक ग्लोब से काम नहीं चलेगा.

लक्ष्य आधारित मूल्यांकन –

अनेक औपचारिक व अनौपचारिक विशेषकर अनौपचारिक मूल्यांकन के तरीके को अपने शिक्षण प्रक्रिया में स्थान दें. मूल्यांकन चाहे जिस तरीके से हो वह लक्ष्य आधारित हो. यह भी सत्य है कि अच्छी तरह से विकसित पाठ्यक्रम में आकलन के घटक स्वमेव शामिल होता है. आकलन के ये घटक पाठ्यक्रम के उद्देश्य, विषयवस्तु, सीखने की गतिविधि और परिणाम के साथ एकीकृत भी होते हैं। समझ आधारित आकलन करते समय यह देखा जाना चाहिए कि बच्चे प्रश्नों के उत्तर किस हद तक समझ के साथ दे रहा है, के साथ-साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि उत्तर में ‘तर्क’ कितना शामिल है तथा क्या प्रक्रिया अपनाई गयी है. एक अच्छा शिक्षक बच्चों का आकलन केवल ग्रेड देने के लिए नहीं बल्कि बच्चों की उपलब्धि को समग्रता में देखता है. साथ ही वह शिक्षक सीखने-सिखाने की प्रक्रिया के दौरान ही बच्चों की उपलब्धि व उन्हें सीखने में आने वाली कठिनाइयों का सतत अनुवीक्षण करते रहता है.

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