सामाजिक विज्ञान की प्रकृति और उद्देश्य

सामाजिक विज्ञान की प्रकृति और उद्देश्य को समझना एक शिक्षक के लिए एक जरूरी उपक्रम है, इसी प्रकृति और उद्देश्य के आधार पर सामाजिक विज्ञान के शिक्षण को दिशा मिलती है।  

सामाजिक विज्ञान की प्रकृति-

सामाजिक विज्ञान का जुडाव सीधे सीधे हमारे गतिशील समाज से है। इस वजह से इसकी प्रकृति भी परिवर्तनशील है। यह समाज के बदलावों व जड़ता एवं उसकी प्रक्रिया का अध्ययन करता है। जब हम समाज के किसी भी परिघटना का अध्ययन करते हैं, तो इसके लिए जरूरी है कि हम इसके विभिन्न पहलूओं व सरोकारों को समझें। सामाजिक विज्ञान में किसी भी परिघटना को एक ही पहलू में न देखकर इसके विभिन्न आयामों यथा इतिहास, भूगोल,राजनीति शास्त्र,अर्थशास्त्र एवं समाजशास्त्र आदि से जोड़कर देखना इसकी जरूरत हो जाती है। सामाजिक विज्ञान का जुड़ाव वैश्विक संदर्भ के साथ स्थानीय विविधताओं से भी है। यह मानव जीवन की परस्पर निर्भरता को समझाते हुए स्थानीय विविधताओं,  राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्धों को  समझने पर बल देता है। प्राकृतिक विज्ञान में सामान्यतः किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचना संभव होता है। जबकि सामाजिक विज्ञान में किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचने के बजाए हमारा बल किसी परिघटना की व्याख्या एवं विवेचना पर रहता है, क्योंकि समाज का स्वरूप विविधतापूर्ण है, जिसमें अध्ययन के विभिन्न आयाम व संभावनाएं भी छिपी हैं। इसी तरह समाज का स्वरूप ऐसा है जिसमें अलग-अलग विचारों व मान्यताओं के लोग रहते हैं ऐसे में अलग-अलग समाजों के कारकों को समझना एवं उनके प्रति संवेदना का विकास सामाजिक विज्ञान की प्रकृति है। सामाजिक विज्ञान संवैधानिक मानदण्डों के आधार पर आदर्श समाज की बात करता है। जैसे  वंचित एवं उपेक्षित तबकों के साथ असमानता व गैर बराबरी के व्यवहार को समाप्त करने के लिए सवाल उठाते हुए सामाजिक विज्ञान प्रगतिशील नीतियों के निर्माण में योगदान देता है। समाजिक बदलाव व जड़ता से उबरने के लिए यह विषय बच्चों को प्रश्न उठाने के लिए प्रेरित करता है। साथ ही बौद्धिक एवं भावात्मक स्तर पर एक दूसरे को समझने, दूसरों को सम्मान देने, अपने लिए सार्थक जीवन का चुनाव करने एवं दूसरों के इस अधिकार को स्वीकार करने के लिए प्रेरित करना भी इसकी प्रकृति में शामिल है। हम सभी अलग-अलग तरह की मान्यताओं व धारणाओं से प्रभावित रहते हैं जो हमारे कामों व विचारों में परिलक्षित होते हैं। सामाजिक विज्ञान निजी मान्यताओं से हटकर घटनाओं और परिघटनाओं की वस्तुनिष्ठता से व्याख्या प्रस्तुत करता है। अर्थात जो जैसा है उसे वैसे ही तथ्यों व प्रमाणों के आधार पर व्याख्या करने पर जोर देता है। सामाजिक मान्यताएं, रीति-रिवाज, धर्म, पंथ, आदि मानव निर्मित हैं। ये विभिन्न समूहों के ऐतिहासिक चयन का नतीजा है। सामाजिक विज्ञान सामाजिक व्यवहारों एवं मान्यताओं को समझने एवं उसके आधारों की पड़ताल करने की बात करता है। समाज में व्याप्त भ्रम एवं अंधविश्वासों पर शंका करने व प्रश्न उठाने की बात करता है। सामाजिक विज्ञान प्रत्येक व्यक्ति के विकास से जुड़ा हुआ है इसलिए यह विषय के अध्ययन को समतावाद की ओर ले जाने का दृष्टिकोण रखता है।

सामाजिक विज्ञान शिक्षण का उद्देश्य –

सामाजिक अध्ययन पढ़ाने का मुख्‍य उद्देश्य विद्यार्थियों को अपने पर्यावरण का ज्ञान, मानवीय सम्बन्धों को समझने की योग्यता, समाज में घट रही घटनाओं के बीच सम्बन्धों की खोज करने की क्षमता, अभिवृत्तियों तथा मूल्यों विशेषकर संवैधानिक मूल्यों का विकास जो कि व्यक्तियों, राज्य, राष्ट्र, और विश्व के मामलों में बुद्धिमत्तापूर्वक भाग लेने के लिए अपरिहार्य है , प्राप्त करने में सक्षम बनाना है। विवेकशील नागरिक और भावनात्मक एकीकरण के लिए सामाजिक विज्ञान का अध्ययन आवश्यक है।

  • अपने समाज और पर्यावरण, और उनमें अपनी स्थिति को बेहतर समझने में मदद करना, समाज को समझने से मिलने वाले खुशी व आनन्द को महसूस करना तथा समाज को समझने के लिए जरूरी बौद्धिक तरीकों, अवधारणाओं, विश्लेषण के तरीकों को सीखना व अपनाना ।
  • सामाजिक विज्ञान में शामिल इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र के विषयवस्तुओं का समग्रता में अध्ययन के माध्यम से विद्यार्थियों में सामाजिक पर्यावरण की समझ देना।
  • सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पहलूओं को समझना, समस्याओं की पहचान करना एवं समाज की बेहतरी के लिए समाधान की ओर बढ़ पाना।
  • बेहतर और न्यायसंगत समाज की कल्पना करने और सामाजिक बदलाव के उचित तरीकों पर विचार करने में मदद करना है।
  • संविधान में उल्लेखित मूल्यों के महत्व को समझना, उन्हें स्थापित करना। इन मूल्यों को बनाए रखने के लिए समाज में शान्ति, सद्भावना, सामंजस्य और एकजुटता के लिए प्रयत्न कर पाना।
  • बेहतर समाज की प्राप्ति के लिए आदर्श समाज के मानकों पर वास्तविक समाज का आलोचनात्मक विश्लेषण कर पाना।
  • बच्चों में सामाजिक मुद्दों के प्रति संवेदनशीलता पैदा करना। लिंग (जेंडर)-संवेदनशीलता, सामाजिक वर्गो और हर प्रकार की असमानताओं के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित करना।
  • विविध मतों, जीवन शैलियों एवं सांस्कृतिक रीति-रिवाजों के सम्मान करने वाले नजरिए का विकास करना।
  • हम जिस समाज में रहते हैं, उसकी संरचना, शासन की संरचना-प्रबंधन को समझना, ताकि एक बेहतर समाज के निर्माण में विवेक से निर्णय लेते हुए ,योगदान दे सके।
  • आधुनिक और समकालीन भारत एवं विश्व के अन्य क्षेत्रों के उदाहरणों के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन व विकास की प्रक्रियाओं को समझना।
  • अपनें क्षेत्र, प्रदेश और देश का अध्ययन वैश्विक संदर्भ में करने के लिए बच्चों को प्रेरित करना।
  • मानव जाति और अन्य जीवों के निवास के रूप में पृथ्वी की अवधारणा को समझना।
  • पर्यावरण और संसाधनों के टिकाऊ व न्यायपूर्ण उपभोग को पर्यावरण के संरक्षण की आवश्यकता के संदंर्भ में समझ पाना।

 

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